बिहार की आत्मा को बाँटता संगीत: एक सांस्कृतिक चेतावनी

 बिहार: जातिवादी गीतों के विरुद्ध एक सांस्कृतिक आत्मनिरीक्षण

बिहार , इतिहास, संस्कृति और बौद्धिकता से समृद्ध एक राज्य , लंबे समय से जातीय पहचान और सामाजिक ढांचे की जटिलता को समेटे हुए है। पूरे भारत में जहाँ जाति एक अहम भूमिका निभाती है, वहीं बिहार में यह राजनीति, सत्ता और लोकप्रिय संस्कृति को भी गहराई से प्रभावित करती रही है। हाल के वर्षों में एक विशेष रूप से चिंताजनक प्रवृत्ति देखने को मिली है , जातिवादी गीतों का उभार, खासकर भोजपुरी संगीत में। ये गीत न केवल सामाजिक रूप से प्रतिगामी हैं, बल्कि बेहद हानिकारक भी।

जातिवादी गीत क्या होते हैं?

जातिवादी गीत वे संगीत ट्रैक होते हैं जो एक जाति को दूसरी जातियों से श्रेष्ठ बताकर महिमामंडित करते हैं। इनमें अक्सर आपत्तिजनक भाषा, जातिसूचक गालियाँ या हिंसक अभिव्यक्तियाँ होती हैं। ये गीत यूट्यूब और सोशल मीडिया पर खूब साझा किए जाते हैं और लाखों व्यूज़ बटोरते हैं , वो भी उनके कला-सामर्थ्य के कारण नहीं, बल्कि जातीय गर्व या प्रतिद्वंद्विता से जुड़ी भावनाओं को भड़काने के कारण।

“संगीत में घाव भरने की ताकत होती है , या उन्हें और गहरा करने की।”



खतरनाक सामान्यीकरण

मनोरंजन के नाम पर ऐसे गीत जातीय वर्चस्व, पक्षपात और कभी-कभी तो हिंसा को भी सामान्य बना देते हैं। कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि ये गीत ‘आत्म-स्वाभिमान’ या ‘प्रतिरोध’ की अभिव्यक्ति हैं, लेकिन ज़्यादातर मामलों में ये समाज में विभाजन और भेदभाव को ही बढ़ावा देते हैं। सबसे चिंता की बात है इनकी पहुँच , ये गीत युवाओं को प्रभावित करते हैं और उन्हें बचपन से ही "हम बनाम वे" की जातिगत सोच सिखाते हैं।

“नफरत अगर गा भी दी जाए, तो वो नफरत ही रहती है , बस उसकी तुकबंदी बेहतर हो जाती है।”

बड़े कलाकार, बड़ी ज़िम्मेदारी

इस प्रवृत्ति का सबसे दुखद पहलू यह है कि इसमें कई प्रसिद्ध भोजपुरी गायक भी शामिल हैं , जिनके पास लाखों प्रशंसक, अपार प्रभाव और व्यापारिक ताकत है। ये वे कलाकार हैं जो सामाजिक नैरेटिव को दिशा दे सकते हैं, परन्तु कई बार इन्होंने जातीय घृणा से भरे गीतों को अपनी आवाज़ देकर इन विभाजनों को और मज़बूत किया है।

“जिसके पास बड़ा माइक है, उसके पास बड़ी नैतिक जिम्मेदारी भी है।”

इन कलाकारों ने संवेदनशीलता और ज़िम्मेदारी की बजाय, पुराने सामाजिक विभाजनों को न सिर्फ दोहराया है बल्कि उनका व्यावसायीकरण भी किया है। प्रसिद्धि के साथ जवाबदेही आनी चाहिए। अगर इंडस्ट्री के सबसे चर्चित चेहरे भी शांति की बजाय मुनाफे को प्राथमिकता देंगे, तो ये युवाओं को क्या संदेश देगा?



इनके पास एक विकल्प है , या तो वे बाँटने वाले गीत गाते रहें, या फिर बदलाव के वाहक बनें। ज़रा सोचिए, अगर बड़े भोजपुरी गायक मिलकर एकता, साझी संस्कृति और गरिमा पर आधारित गीत गाएं , तो वह कितना सशक्त संदेश होगा। यही वह प्रभाव है जिसकी आज बिहार को सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।

“कलाकार का काम केवल मनोरंजन नहीं — समाज को ऊपर उठाना भी होता है।”

समाज पर असर

जातिवादी गीतों का प्रभाव केवल बोलों तक सीमित नहीं रहता:

  • पूर्वाग्रहों को मज़बूती: जातियों का मज़ाक उड़ाने या उन्हें श्रेष्ठ बताने वाले गीत पुराने भेदभावों को और गहरा करते हैं।

  • सामाजिक तनाव: गाँवों और कस्बों में ये गीत शादी-ब्याह या त्योहारों में वास्तविक झगड़ों की वजह बनते हैं।

  • प्रगति में बाधा: जब बिहार को गरीबी, बेरोज़गारी और पलायन जैसे मुद्दों से लड़ने के लिए एकता की ज़रूरत है, ये गीत युवाओं को पीछे की ओर खींचते हैं।

  • कानूनी और नैतिक सवाल: भारत में घृणास्पद भाषण कानूनन अपराध है, फिर भी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर ऐसे गीत अक्सर बिना जवाबदेही के बच निकलते हैं।

“एक समाज जो अपने विभाजन को गाता है, वह एकता में आगे नहीं बढ़ सकता।”

कलाकारों और प्लेटफॉर्म्स की ज़िम्मेदारी

कलाकारों, म्यूज़िक प्रोड्यूसर्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं कि आप समाज को तोड़ने वाली बातें कहें। कंटेंट मॉडरेशन को और कड़ा करने की ज़रूरत है, समुदाय की रिपोर्टिंग को बढ़ावा मिलना चाहिए और सबसे ज़रूरी , सामाजिक जागरूकता होनी चाहिए। भोजपुरी संगीत में एकता और संघर्ष की कहानियाँ कहने की ताकत है , तो इसका उपयोग गिराने के लिए क्यों, उठाने के लिए क्यों नहीं?

“बिना नैतिकता की अभिव्यक्ति — शोषण है।”

एक सांस्कृतिक आत्मनिरीक्षण की पुकार

जातिवाद के खिलाफ लड़ाई सिर्फ कानूनी या राजनीतिक नहीं , यह एक सांस्कृतिक लड़ाई भी है। और संस्कृति बनती है उन कहानियों से जो हम कहते हैं, उन गीतों से जो हम गाते हैं और उन प्रतीकों से जिन्हें हम पूजते हैं। एक उपभोक्ता, एक रचनाकार और एक नागरिक के रूप में हमें खुद से पूछना होगा:

क्या हम उन आवाज़ों को बढ़ावा दे रहे हैं जो हमें बाँटती हैं, या उन्हें जो हमें जोड़ती हैं?

“अगर संगीत लोगों की आत्मा है, तो हमें इस आत्मा को ज़हर से बचाना होगा।”

जिस धरती ने बुद्ध, चाणक्य और नालंदा जैसी विभूतियाँ दीं, वह जातिवादी तुकबंदियों से कहीं ज़्यादा की हकदार है। आइए, हम अपने संगीत को बिहार की असली पहचान — बुद्धिमत्ता, सहनशीलता और सबके सम्मान की गूंज बनाएँ।

Comments

Popular posts from this blog

Nepal’s Gen Z Uprising: A Wake-Up Call Next Door

📰 India-Pakistan 2025 Conflict: A New Chapter in Escalation, Strategy, and Defense Power

Everyday Healthy Living in 2025: Science-Backed Habits for Body, Mind & Digital Balance